हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं भारत का मान ,सम्मान और स्वाभिमान है : अखिलेश राज 


रोजगार परक युग में जहां एक तरफ युवा पीढ़ी यह जानती है कि अंग्रेजी नौकरी पाने की भाषा है और इसके बिना रोजगार संभव नहीं है वहीं दूसरी तरफ इन युवाओं को यह ज्ञान कराना होता है कि हिंदी मातृभाषा के साथ साथ राष्ट्र का मान ,सम्मान और स्वाभिमान भी है। ये वाक्य थे समारोह के मुख्य अतिथि अखिलेश राज के। वे स्थानीय उच्च विद्यालय के केदार प्रसाद सभागार में आयोजित हिंदी दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। विदित हो कि विद्यालय परिवार के द्वारा इस अवसर पर कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया था जिसमें सरिता सिंह नेपाली , हरिद्वार मस्ताना , अविनाश पांडेय , राजकिशोर कुमार और जफर कासमी ने अपनी कविता से सबको झुमा डाला। समारोह का शुभारंभ  मुख्य अतिथि अखिलेश राज, विशिष्ट अतिथि भोट चतुर्वेदी, अवधेश तिवारी,बर्मा प्रसाद, डॉ.आफताब आलम और अवध किशोर सिन्हा सहित अध्यक्ष छोटेलाल प्रसाद और देवेन्द्र कुमार गुप्ता ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर किया।  प्रथम सत्र के कार्यक्रम में सरस्वती वंदना युवा कवि साहित्यकार मुकुंद मुरारी राम ने प्रस्तुत किया । छात्रों में आकाश कुमार , विशाल कुमार और ओसामा हुसैन ने भी काव्य पाठ किया। प्रथम सत्र के कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधानाध्यापक देवेन्द्र कुमार गुप्ता ने की जबकि दूसरे सत्र यानि कवि सम्मेलन की अध्यक्षता छोटेलाल प्रसाद ने की और बेजोड़ संचालन साहित्य शताब्दी सम्मान प्राप्त युवा कवि साहित्यकार मुकुंद मुरारी राम ने किया। मुख्य अतिथि अखिलेश राज ने कहा हम सभी भाषा के प्रति आदर भाव रखें लेकिन हिंदी स्थान हृदय में रहे यही सबसे बड़ा गौरव और सम्मान होगा अपनी राष्ट्रभाषा के लिए। विशिष्ट अतिथि भोट चतुर्वेदी ने कहा कि अनेकता में एकता हिन्द की विशेषता को जब चरितार्थ करना होता है तो इस देश की एक मात्र भाषा हमारी हिन्दी सबसे अग्रणी भूमिका निभाती है। समारोह में स्वागत संबोधन लोकेश कुमार पाठक ने करते हुए कहा कि यह विद्यालय प्रधानाध्यापक के कौशल की बदौलत आज हर कार्यक्रम धूमधाम से मना कर छात्रों में चेतना और ऊर्जा भरने का जो काम कर रहा है ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया , यह निःसंदेह सराहनीय और अनुकरणीय कदम है। विशिष्ट अतिथि अवधेश तिवारी, बर्मा प्रसाद, डॉ.आफताब आलम और अवध किशोर सिन्हा के साथ शिक्षक उमेश यादव, डॉ.अरविंद तिवारी आदि ने समारोह को संबोधित किया। धन्यवाद ज्ञापन आचार्य मधुसूदन चतुर्वेदी ने किया ।

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